करौली की कैलादेवी - श्रीकृष्ण की बहिन योगमाया का अवतार "Kaila Devi-Karauli"

Kaila Devi Mata
            पूर्वी राजस्थान का प्रसिद्ध शक्तिपीठ कैला देवी (Kaila Devi) करौली से लगभग 25 की.मी. की दूरी पर स्थित है । वहाँ त्रिकूट पर्वत की सुरम्य घाटी में बना कैला देवी का भव्य मंदिर अपने शिल्प और स्थापत्य के कारण तो दर्शनीय है ही साथ ही देश के कोने-कोने से आने वाले लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का भी पावन केन्द्र है । करौली के लाल पत्थरों की लालिमा के मध्य कैलादेवी का स्वर्ण कलश युक्त सफेद संगमरमर से बना यह भव्य मन्दिर अपनी लहराती लाल पताकाओं से सफेद और लाल रंगो के सम्मिश्रण का अदभुत दृश्य प्रस्तुत करता हुआ वहाँ आने वाले दर्शनार्थियों को सम्मोहित करता है । विशेषकर प्रतिवर्ष चैत्र मास की नवरात्रा में लाखों श्रद्धालुओं का वहाँ आगमन होता है ।

Kaila Devi Temple
             कैलादेवी करौली के यदुवंशी राज परिवार की कुलदेवी है, जो लोक में करौलीमाता के नाम से भी प्रसिद्ध है ।  कैलादेवी की उक्त प्रतिमा कब बनी तथा किसने बनवाई इस सम्बन्ध में प्रामाणिक जानकारी का आभाव है तथा अनेक किंवदन्तियाँ प्रचलित है। यदुवंशी होने के कारण करौली राजवंश का सम्बन्ध भगवान श्रीकृष्ण से जोड़ा जाता है । जब कंश ने नारद की भविष्यवाणी से भयभीत होकर वासुदेव और देवकी को कारागृह में डाल  दिया तो वहाँ देवकी ने एक कन्या को जन्म दिया । जब कंश ने इस कन्या को मारना चाहा तो वह उसके हाथ से छूटकर आकाश में चली गयी । तदुपरांत यही कन्या योग माया बनकर भू मण्डल पर अवतरित हुई तथा करौली के त्रिकूट पर्वत पर कैलादेवी के नाम से प्रसिद्ध हुई ।
Yogmaya
               एक जनश्रुति के अनुसार त्रिकूट पर्वत के समीपस्थ जंगल में नरकासुर नामक राक्षस का बहुत आतंक था, जिसका वध करने के लिए इस क्षेत्र के शासक राघवदास ने देवी की उक्त प्रतिमा का निर्माण करवाया । देवी ने काली का रूप धारणकर नरकासुर का संहार किया तथा तभी से आस पास के प्रदेश के लोगो द्वारा  देवी की उपासना होने लगी । कैलादेवी के इस भव्य मन्दिर का स्थापत्य लगभग सत्रहवीं-अठारहवीं  शताब्दी ई.का है । मन्दिर के पार्श्व में कालीसिल नदी धनुषाकृति में बहती हैं । नदी के पवित्र जल में स्नान करने के उपरान्त श्रद्धालु देवी के दर्शनार्थ वहाँ आते हैं ।
Kalisil River
               इस मन्दिर में कैलादेवी की प्रतिमा के साथ चमुण्डामाता का विग्रह भी स्थित है । लोकमान्यता है की चांदी की कलात्मक चौकी पर विराजमान कैलादेवी के विग्रह का मुख थोड़ा टेढ़ा है । देवी का मुख टेढ़ा होने के बारे में अनेक कहानियाँ प्रचलित है । सर्वाधिक प्रचलित मान्यता के अनुसार देवी के एक भक्त को किसी कारणवश मन्दिर में प्रवेश नहीं करने दिया तथा वह देवी के दर्शन किये बिना ही वापस लौटा दिया गया तब से अप्रसन्न होकर देवी उसी दिशा में निहार रही है ।
               कैलादेवी को प्रसन्न कर मनोवांछित फल पाने का सबसे सीधा सरल उपाय उनके गण लांगुरिया को राजी करना माना जाता है । कैलादेवी के मन्दिर में पूजा - उपासना का सिलसिला प्रतिदिन प्रातः चार बजे मंगला आरती व झांकी से प्रारम्भ होता है । प्रातः ग्यारह बजे राज भोग और बारह बजे दिवस सयन होता है । मध्याह्न से रात्रि नौ बजे तक मन्दिर में दर्शनार्थियों का तांता लगा रहता है । 

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About Sanjay Kumar Sharma

A Blogger working to illuminate Indian heritage and culture.
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9 comments:

  1. Jai Mata RajRajeshwari karoli wali Kela devi ji ki.
    Maa ke charano me lakh lakh pranam N sadar naman.


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  2. Jai ho meri kela maiya
    Sare dukh dur karo ma
    Meri manokamna puri karo mai jaldi hi aa rha hu maiya aapke darshan karne.
    Jai kela mai ki jai

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  3. Jai ho meri kela maiya
    Sare dukh dur karo ma
    Meri manokamna puri karo mai jaldi hi aa rha hu maiya aapke darshan karne.
    Jai kela mai ki jai

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  4. Jai Maa Kaila Devi Maiya Ki Jai
    Jai Maa Bijasan Devi Maiya Ki Jai

    Regards,
    Pankaj Gupta

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  5. Jai Karauli vali maiya... Jai Maa Kaila Devi... Sabki Manokamna puri karo maa

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  6. Jai ho meri Kaila Maiya.. Jai Kaila Mata... Jai Maa Bhawani

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  7. Jai Maa rajrajeshwari keladevi aapke charano mai saadar pranam Maa meri manokamna poori kar mujhe bhi apne darwar Mai bulaao

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  8. Jai kaila devi ki..... Bt kaila devi ki aor akbar ke baar me bhi to kahani hai bro...

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मिशन कुलदेवी से जुडने के लिये आपका धन्यवाद